HUKAMNAMA SRI DARBAR AMRITS Ang 702 Date 09-01-2025

 LABANA JAGRATI SANDESH


AMRIT VELE DA


 HUKAMNAMA 

 SRI DARBAR 

AMRITS Ang 702 

 Date 09-01-2025



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AMRIT VELE DA HUKAMNAMA SRI DARBAR SAHIB SRI AMRITSAR
ANG 702, 
Date: 09-01-2025

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ਜੈਤਸਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥ 

ਆਏ ਅਨਿਕ ਜਨਮ ਭ੍ਰਮਿ ਸਰਣੀ ॥ ਉਧਰੁ ਦੇਹ ਅੰਧ ਕੂਪ ਤੇ ਲਾਵਹੁ ਅਪੁਨੀ ਚਰਣੀ ॥੧॥

 ਰਹਾਉ ॥ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਕਿਛੁ ਕਰਮੁ ਨ ਜਾਨਾ ਨਾਹਿਨ ਨਿਰਮਲ ਕਰਣੀ ॥ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਅੰਚਲਿ ਲਾਵਹੁ ਬਿਖਮ ਨਦੀ ਜਾਇ ਤਰਣੀ ॥੧॥ 

ਸੁਖ ਸੰਪਤਿ ਮਾਇਆ ਰਸ ਮੀਠੇ ਇਹ ਨਹੀ ਮਨ ਮਹਿ ਧਰਣੀ ॥ ਹਰਿ ਦਰਸਨ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਪਾਵਤ ਹਰਿ ਨਾਮ ਰੰਗ ਆਭਰਣੀ ॥੨॥੮॥੧੨॥

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ਅਰਥ:
ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਅਸੀਂ ਜੀਵ ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਵਿਚ ਭੌਂ ਕੇ ਹੁਣ ਤੇਰੀ ਸਰਨ ਆਏ ਹਾਂ। ਸਾਡੇ ਸਰੀਰ ਨੂੰ (ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਦੇ) ਘੁੱਪ ਹਨੇਰੇ ਖੂਹ ਤੋਂ ਬਚਾ ਲੈ, ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਜੋੜੀ ਰੱਖ।੧।ਰਹਾਉ। 

ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਮੈਨੂੰ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੀ ਸੂਝ ਨਹੀਂ, ਮੇਰੀ ਸੁਰਤਿ ਤੇਰੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਜੁੜੀ ਨਹੀਂ ਰਹਿੰਦੀ, ਮੈਨੂੰ ਕੋਈ ਚੰਗਾ ਕੰਮ ਕਰਨਾ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ, ਮੇਰਾ ਕਰਤੱਬ ਭੀ ਸੁੱਚਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਮੈਨੂੰ ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਦੇ ਲੜ ਲਾ ਦੇ, ਤਾ ਕਿ ਇਹ ਔਖੀ (ਸੰਸਾਰ-) ਨਦੀ ਤਰੀ ਜਾ ਸਕੇ।੧। 

ਦੁਨੀਆ ਦੇ ਸੁਖ, ਧਨ, ਮਾਇਆ ਦੇ ਮਿੱਠੇ ਸੁਆਦ- ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਦਾਸ ਇਹਨਾਂ ਪਦਾਰਥਾਂ ਨੂੰ (ਆਪਣੇ) ਮਨ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਵਸਾਂਦੇ। ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਦਰਸਨ ਨਾਲ ਹੀ ਉਹ ਸੰਤੋਖ ਹਾਸਲ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਪਿਆਰ ਹੀ ਉਹਨਾਂ (ਦੇ ਜੀਵਨ) ਦਾ ਗਹਣਾ ਹੈ ॥੨॥੮॥੧੨॥


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जैतसरी महला ५ ॥ 

आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥ उधरु देह अंध कूप ते लावहु अपुनी चरणी ॥१॥ रहाउ ॥ 

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाना नाहिन निरमल करणी ॥ साधसंगति कै अंचलि लावहु बिखम नदी जाइ तरणी ॥१॥ 

सुख स्मपति माइआ रस मीठे इह नही मन महि धरणी ॥ हरि दरसन त्रिपति नानक दास पावत हरि नाम रंग आभरणी ॥२॥८॥१२॥

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अर्थ: 

हे प्रभु! हम जीव कई जन्मो से गुज़र कर अब तेरी सरन में आये हैं। हमारे सरीर को (माया के मोह के) घोर अँधेरे कुँए से बचा ले, आपने चरणों में जोड़े रख।१।रहाउ। 

हे प्रभु! मुझे आत्मिक जीवन की कोई समझ नहीं है, मेरी सुरत तेरे चरणों में जुडी नहीं रहती, मुझे कोई अच्छा काम करना नहीं आता, मेरा आचरण भी पवित्र नहीं है। हे प्रभु! हे प्रभु मुझे साध सांगत के चरणों मे लगा दे, ताकि यह मुश्किल (संसार) नदी पार की जा सके।१। 

दुनिया के सुख, धन, माया के मीठे स्वाद-परमात्मा के दास इन पदार्थों को (अपने) मन में नहीं बसाते। हे नानक! परमात्मा के दर्शन से ही वह संतोख साहिल करते हैं, परमात्मा के नाम का प्यार ही उनके जीवन का गहना है॥२॥८॥१२॥
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In English: 

Jaitasaree mahalaa 5 ||

Aae anik janam bhrmi sara(nn)ee || Udharu deh anddh koop te laavahu apunee chara(nn)ee ||1|| rahaau ||

Giaanu dhiaanu kichhu karamu na jaanaa naahin niramal kara(nn)ee || Saadhasanggati kai ancchali laavahu bikham nadee jaai tara(nn)ee ||1||

Sukh samppati maaiaa ras meethe ih nahee man mahi dhara(nn)ee || Hari darasan tripati naanak daas paavat hari naam rangg aabhara(nn)ee ||2||8||12ll12ll

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Meaning:

Jaitsree, Fifth Mehl: 

After wandering through so many incarnations, I have come to Your Sanctuary. Save me – lift my body up out of the deep, dark pit of the world, and attach me to Your feet. ||1||Pause|| 

I do not know anything about spiritual wisdom, meditation or karma, and my way of life is not clean and pure. Please attach me to the hem of the robe of the Saadh Sangat, the Company of the Holy; help me to cross over the terrible river. ||1||

 Comforts, riches and the sweet pleasures of Maya – do not implant these within your mind. Slave Nanak is satisfied and satiated by the Blessed Vision of the Lord’s Darshan; his only ornamentation is the love of the Lord’s Name. ||2||8||12||

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