अपनी प्रात: का शुभारंभ प्रभु परमात्मा, श्री हरि स्मरण से करिये।Sachkhand Sri Harmandir Sahib Amritsar Vikhe Hoyea Amrit Wele Da Mukhwak : 27-05-2024

 अपनी प्रात: का शुभारंभ प्रभु परमात्मा, श्री हरि स्मरण से करिये।




Sachkhand Sri Harmandir Sahib Amritsar Vikhe Hoyea Amrit Wele Da Mukhwak : 27-05-2024


🙏 श्री हरमिन्दर साहिब (स्वर्ण मन्दिर) अमृतसर में श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी  के अंग 623 दिनांक 27-05-2024  को  प्रात: जारी गुरुबाणी, अमृतवचन/हुकमनामा : पंजाबी, हिन्दी व अंग्रेजी में अर्थ सहित पढ़िए....
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AMRIT VELE DA HUKAMNAMA SRI DARBAR SAHIB, SRI AMRITSAR, 

ANG 623, Date 27-05-24

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ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਵਿਚਿ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਖਲੋਆ ॥ ਵਾਲੁ ਨ ਵਿੰਗਾ ਹੋਆ ॥ ਮਜਨੁ ਗੁਰ ਆਂਦਾ ਰਾਸੇ ॥ ਜਪਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸੇ ॥੧॥ ਸੰਤਹੁ ਰਾਮਦਾਸ ਸਰੋਵਰੁ ਨੀਕਾ ॥ ਜੋ ਨਾਵੈ ਸੋ ਕੁਲੁ ਤਰਾਵੈ ਉਧਾਰੁ ਹੋਆ ਹੈ ਜੀ ਕਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਜੈ ਜੈ ਕਾਰੁ ਜਗੁ ਗਾਵੈ ॥ ਮਨ ਚਿੰਦਿਅੜੇ ਫਲ ਪਾਵੈ ॥ ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਨਾਇ ਆਏ ॥ ਅਪਣਾ ਪ੍ਰਭੂ ਧਿਆਏ ॥੨॥ ਸੰਤ ਸਰੋਵਰ ਨਾਵੈ ॥ ਸੋ ਜਨੁ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਵੈ ॥ ਮਰੈ ਨ ਆਵੈ ਜਾਈ ॥ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥੩॥ ਇਹੁ ਬ੍ਰਹਮ ਬਿਚਾਰੁ ਸੁ ਜਾਨੈ ॥ ਜਿਸੁ ਦਇਆਲੁ ਹੋਇ ਭਗਵਾਨੈ ॥ ਬਾਬਾ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥ ਸਭ ਚਿੰਤਾ ਗਣਤ ਮਿਟਾਈ ॥੪॥੭॥੫੭॥


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सोरठि महला ५ ॥ विचि करता पुरखु खलोआ ॥ वालु न विंगा होआ ॥ मजनु गुर आंदा रासे ॥ जपि हरि हरि किलविख नासे ॥१॥ संतहु रामदास सरोवरु नीका ॥ जो नावै सो कुलु तरावै उधारु होआ है जी का ॥१॥ रहाउ ॥ जै जै कारु जगु गावै ॥ मन चिंदिअड़े फल पावै ॥ सही सलामति नाइ आए ॥ अपणा प्रभू धिआए ॥२॥
संत सरोवर नावै ॥ सो जनु परम गति पावै ॥ मरै न आवै जाई ॥ हरि हरि नामु धिआई ॥३॥ इहु ब्रहम बिचारु सु जानै ॥ जिसु दइआलु होइ भगवानै ॥ बाबा नानक प्रभ सरणाई ॥ सभ चिंता गणत मिटाई ॥४॥७॥५७॥


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Sorat’h, Fifth Mehl: 

The Creator Lord Himself stood between us, and not a hair upon my head was touched. The Guru made my cleansing bath successful; meditating on the Lord, Har, Har, my sins were erased. ||1||


 O Saints, the purifying pool of Ram Das is sublime. Whoever bathes in it, his family and ancestry are saved, and his soul is saved as well. ||1||Pause||


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ਅਰਥ
(ਹੇ ਭਾਈ! ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦਾ) ਆਤਮਕ ਇਸ਼ਨਾਨ ਗੁਰੂ ਨੇ ਸਫਲ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਜਪ ਜਪ ਕੇ (ਆਪਣੇ ਸਾਰੇ) ਪਾਪ ਨਾਸ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਸਰਬ-ਵਿਆਪਕ ਕਰਤਾਰ ਆਪ ਉਸ ਦੀ ਸਹੈਤਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, (ਉਸ ਦੀ ਆਤਮਕ ਰਾਸਿ-ਪੂੰਜੀ ਦਾ) ਰਤਾ ਭਰ ਭੀ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ।੧। 


ਹੇ ਸੰਤ ਜਨੋ! ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ (ਇਕ) ਸੁੰਦਰ (ਅਸਥਾਨ) ਹੈ। ਜੇਹੜਾ ਮਨੁੱਖ (ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ) ਆਤਮਕ ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰਦਾ ਹੈ (ਮਨ ਨੂੰ ਨਾਮ-ਜਲ ਨਾਲ ਪਵਿਤ੍ਰ ਕਰਦਾ ਹੈ) , ਉਸ ਦੀ ਜਿੰਦ ਦਾ (ਵਿਕਾਰਾਂ ਤੋਂ) ਪਾਰ-ਉਤਾਰਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣੀ ਸਾਰੀ ਕੁਲ ਨੂੰ ਭੀ (ਸੰਸਾਰ-ਸਮੁੰਦਰ ਤੋਂ) ਪਾਰ ਲੰਘਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ।੧।ਰਹਾਉ।

 ਹੇ ਭਾਈ! ਜੇਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਰਾਮ ਦੇ ਦਾਸਾਂ ਦੇ ਸਰੋਵਰ ਵਿਚ ਟਿਕ ਕੇ) ਆਪਣੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਆਰਾਧਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, (ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਇਸ ਸਤਸੰਗ-ਸਰੋਵਰ ਵਿਚ ਆਤਮਕ) ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰ ਕੇ ਆਪਣੀ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੀ ਰਾਸਿ-ਪੂੰਜੀ ਨੂੰ ਪੂਰਨ ਤੌਰ ਤੇ ਬਚਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਸਾਰਾ ਜਗਤ ਉਸ ਦੀ ਸੋਭਾ ਦਾ ਗੀਤ ਗਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਮਨ-ਚਿਤਵੇ ਫਲ ਹਾਸਲ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ।੨। 

ਹੇ ਭਾਈ! ਜੇਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਸੰਤਾਂ ਦੇ ਸਰੋਵਰ ਵਿਚ (ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ) ਆਤਮਕ ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸਭ ਤੋਂ ਆਤਮਕ ਅਵਸਥਾ ਹਾਸਲ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ। ਜੇਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੇ ਗੇੜ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ।੩। 

ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਦੀ ਇਸ ਵਿਚਾਰ ਨੂੰ ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸਮਝਦਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਉੱਤੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਦਇਆਵਾਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਆਖ-) ਹੇ ਭਾਈ! ਜੇਹੜਾ ਮਨੁੱਖ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਪਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣਾ ਹਰੇਕ ਕਿਸਮ ਦਾ ਚਿੰਤਾ-ਫ਼ਿਕਰ ਦੂਰ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ।੪।੭।੫੭।


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अर्थ
(हे भाई! साध-संगति में जिस मनुष्य का) आत्मिक स्नान गुरू ने सफल कर दिया, वह मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जप-जप के (अपने सारे) पाप नाश कर लेता है। सर्व-व्यापक करतार खुद उसकी सहायता करता है, (उसकी आत्मिक राशि-पूँजी का) रक्ती भर भी नुकसान नहीं होता।1। 


हे संत जनो! साध-संगति (एक) सुंदर (स्थान) है। जो मनुष्य (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है (मन को नाम-जल से पवित्र करता है), उसके जीवन का (विकारों से) पार-उतारा हो जाता है, वह अपनी सारी कुल को भी (संसार समुंद्र से) पार लंघा लेता है।1। रहाउ। हे भाई! (जो मनुष्य राम के दासों के सरोवर में टिक के) अपने परमात्मा की आराधना करता है, (वह मनुष्य इस सत्संग-सरोवर में आत्मिक) स्नान कर के अपनी आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी को पूर्ण-तौर पर बचा लेता है। सारा जगत उसकी शोभा के गीत गाता है, वह मनुष्य मन-वांछित फल हासिल कर लेता है।2। 


हे भाई! जो मनुष्य संतो के सरोवर में (साध-संगति में) आत्मिक स्नान करता है, वह मनुष्य सबसे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता है, वह जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।3। हे भाई! परमात्मा के मिलाप की इस विचार को वही मनुष्य समझता है जिस पर परमात्मा खुद दयावान होता है। हे नानक! (कह–) हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है, वह अपनी हरेक किस्म की चिंता-फिक्र दूर कर लेता है।4।7।57।

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