40 मुक्तों की पवित्र धरती: मुक्तसर मुक्ति का घर: गुरुद्वारा टूटी गांधी साहिब
मुक्तसर मुक्ति का घर
गुरुद्वारा श्री मुक्तसर साहिब सिखों का प्रमुख तीर्थ स्थल है। यह शहर चालीस मुक्तों की शहादत की याद दिलाता है। यह दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज से जुड़ा इतिहास है।
आनंद पुर साहिब की घेराबंदी के दौरान, 40 सिखों का एक समूह गुरुजी को छोड़ कर यह बेदावा लिख कर गुरुजी को देकर गये वे गुरु जी सिख नहीं है। हालाँकि, जब वे अपने घर लौटे, तो उनकी महिलाओं सहित सभी ने उनकी निंदा की।
एक साहसी महिला माई भागो जी की अगुवाई में सभी 40 सिख गुरु जी का साथ देने और गुरुजी से क्षमा मांगने निकले । इस बीच गुरु गोबिंद सिंह जी आनंदपुर साहिब छोड़ चुके थे। और मुगल सेना इनका पीछा कर रही थी, गुरु गोबिंद सिंह जी मालवा क्षेत्र की ओर चले गए। वह खिदराना की ढाब पहुंचे, जो उस समय क्षेत्र में पानी का एकमात्र स्रोत था।
जब गुरु जी यहां विश्राम कर रहे थे तो पीछा कर रही मुगल सेना नजदीक आ गई। उसी समय चालीस सिक्खों का जत्था जो क्षमा माँगने के लिए गुरु की खोज कर रहा था, वह भी वहाँ पहुँच गया।
स्थिति का तुरंत संभालते हुए, सिखों के इस समूह ने मुगल सैनिकों से जमकर लड़ाई लड़ी, और गुरु जी ने युद्ध में एक छोटी पहाड़ी "टिब्बी" से दुश्मनों पर तीर चलाये। मुगल सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया।
भीषण युद्ध में चालिस सिखों में से दो को छोड़कर सभी की मृत्यु हो गई, दोनों सिख गंभीर रूप से ज़खमी हो गये थे, मुगलों के पीछे हटने के बाद गुरु साहिब युद्ध के मैदान में अपने प्रत्येक सिख को गोद में उठाया और आशीर्वाद दिया। जीवित बचे दो लोगों में से एक, भाई महान सिंह के पास पहुंचे, और गुरुजी ने इनकी बहादुरी पर प्रसन्न होकर इनकी अन्तिम इच्छा पूछी । तभी भाई महान सिंह ने गुरुजी को माफ करने और आनंदपुर साहिब में उन्हें अपने गुरु के रूप में अस्वीकार करने वाले हस्ताक्षरित बेदावा पत्र को फाड़ने के लिए कहा।
गुरु साहिब ने भाई महान सिंह की अन्तिम इच्छा को स्वीकार कर लिया, और बेदावा त्याग पत्र निकाल कर फाड़ दिया, इस प्रकार चालीस सिखों को मुक्त कर दिया गया। भाई महान सिंह ने गुरु जी की गोद में अंतिम सांस ली। गुरुजी ने इन सभी चालिस सिखों का एक साथ अन्तिम संस्कार किया, उस स्थान को गुरुद्वारा अंगीठा साहिब के नाम से जाना जाता है। इसी स्थान जहां मुगलों जंग हुई और चालिस सिख शहीद हुए उसी शहर को मुक्तसर साहिब कहा जाता है।
उस समय माई भागो गंभीर रूप से बीमार थीं, जो बाद ठीक हो गईं और कई वर्षों तक गुरु की सेवा की।
इस घटना को सिखों द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली अरदास में इन शहीद चालिस सिखों भी "चाली मुक्ते" के नाम से याद किया जाता है। बेदावा पत्र फाड़कर गुरु साहिब ने अपने सिखों के साथ टूटी गांठ फिर बांध ली। इस लिये लिये इस स्थान को "टूटी गंधी", "टूटी गांढनहार" या टूटे हुए संबंध को पुन: जोडने वाले के रूप में जाना जाता है।
यहां सभी गुरु परुर्गुव बहुत धूमधाम से मनाये जाते है।
इसके अलावा, चालीस मुक्तों के बलिदान की स्मृति में 12 और 13 जनवरी को माघ मेले का आयोजन किया जाता है।
यहां नेग सिंगों का बहूत बड़ा स्थान है जिसे "नेगों की छावनी" के नाम से जाना जाता है।
दिवाली और बैसाखी भी मनाई जाती है. आवास: यहां भक्तों के लिए यात्रा के दौरान ठहरने के लिए चालीस कमरों वाला श्री कलंगीधर निवास उपलब्ध है।
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