गुरु हरिराय साहिब जी पावन प्रकाश पर्व शनिवार 10 व रविवार 11 फरवरी, 2024 को
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ
"सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥
दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥"
"(श्री गुरुग्रन्थ साहिब जी अंग 44, अर्थात: वह मुहूर्त एवं घड़ी भी फलदायक है, जब सत्य स्वरूप परमेश्वर से प्रेम किया जाता है। जिस प्राणी को ईश्वर के नाम का आधार प्राप्त है, उसे कोई भी दुःख-दर्द उत्पन्न नहीं होता)"
साहिब श्री गुरु हरिराय साहिब जी का पावन प्रकाश पर्व
शनिवार 10 व रविवार 11 फरवरी, 2024 को
सिख पंथ के 7वें गुरु श्री गुरु हरिराय साहिब का प्रकाश पर्व शनिवार 10 व रविवार 11 फरवरी 2024 को गुरुनानक सेवा सोसायटी, गुरु नानक गंज, अजमेर की अगुवाई में गुरुद्वारा श्री गुरु नानक सभा गुरु नानक गंज, अजमेर के दरबार हाल में मनाया जायेगा।
गुरुपर्व पर महान गुरुबाणी शब्द कीर्तन दरबार शनिवार 10 फरवरी 2024 को सायं काल 7.30 बजे से 10.30 बजे तक गुरुद्वारा हाल में,
दूसरा विशेष कीर्तन दरबार कीर्तन दरबार रविवार 11 फरवरी 2024 को प्रातःकाल 11.00 बजे से 2.00 बजे तक जनक पुरी धर्मशाला, गंज में,
एवं तीसरा कीर्तन दरबार सायं काल 7.30 बजे से 10.30 बजे तक गुरुद्वारा हाल में सजाया जाएगा।
जिसमें पंथ के प्रसिद्ध (हजूरी रागी, (गुरुद्वारा गुरु नानक सभा, गंज, अजमेर), अपनी मधुर वाणी द्वारा गुरुबाणी हरजस गायन कर संगत को निहाल करेंगे। तीनों गुरुबाणी कीर्तन दरबार उपरान्त अरदास, मुखवाक, एवं अटूट गुरु का लंगर प्रसाद वितरित होगा।
श्री गुरु हरिराय साहिब का जीवन प्रकाश पर विशेष :
सिख पंथ के 7वें गुरु श्री गुरु हरिराय साहिब का प्रकाश कीरतरपुर साहिब, जिला रोपड़, (पंजाब) में 26 फरवरी 1630 को बाबा गुरदिता - माता निहाल कौर के घर हुथा था।
गुरू हरगोविन्द साहिब जी ने अपने जीवन काल में ही अपने पोते हरिराय साहिब जी को 14 वर्ष की छोटी आयु में 3 मार्च 1644 को '7 वें नानक' के रूप में घोषित किया था।
श्री गुरू हरिराय साहिब जी का विवाह माता किशन कौर जी, जो कि अनूप शहर (बुलन्दशहर), उत्तर प्रदेश के श्री दया राम जी की पुत्री थी, के साथ हर सूदी 3, सम्वत् 1697 को हुआ। गुरू हरिराय साहिब जी के दो पुत्र थे श्री रामराय वडवाल और श्री हरकिशन साहिब जी, श्री हरकिशन साहिब जी जो कि सिख पंथ के 8वें गुरु थे।
श्री गुरू हरिराय साहिब जी का स्वभाव शांती पूर्ण था जो कि लोगों को प्रभावित करता था। श्री गुरु हरिराय साहिब जी ने अपने दादा गुरू हरगोविन्द साहिब जी के सिख योद्धाओं के दल को पुनर्गठित किया।
उन्होंने सिख योद्धाओं में नवीन प्राण संचारित किए। वे एक आध्यात्मिक पुरुष होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे। अपने राष्ट्र केन्द्रित विचारों के कारण मुगल औरंगजेब को परेशानी हो रही थी।
औरंगजेब का आरोप था कि गुरू हरिराय साहिब जी ने दारा शिकोह (शाहजहां के सबसे बड़े पुत्र) की सहायता की है। दारा शिकोह संस्कृत भाषा के विद्वान थे। और भारतीय जीवन दर्शन उन्हें प्रभावित करने लगा था।
एक बार गुरू हरिराय साहिब जी मालवा और दोआबा क्षेत्र से प्रवास करके लौट रहे थे, तब मोहम्मद यारबेग खान ने उनके काफिले पर अपने एक हजार सशस्त्र सैनिकों के साथ हमला बोल दिया।
इस अचानक हुए आक्रमण का गुरू हरिराय साहिब जी ने सिख योद्धाओं के साथ मिलकर बहुत ही दिलेरी एवं बहादुरी के साथ प्रत्युत्तर दिया। दुश्मन को जान व माल की भारी हानि हुई एवं वे युद्ध के मैदान से भाग निकले।
आत्म सुरक्षा के लिए सशस्त्र आवश्यक थे, भले ही व्यक्तिगत जीवन में वे अहिंसा परमो धर्म के सिद्धान्त को अहम मानते हों।
श्री गुरू हरिराय साहिब जी प्रायः सिख योद्धाओं को बहादुरी के पुरस्कारों से नवाजा करते थे।
श्री गुरू हरिराय साहिब जी ने कीरतपुर में एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी दवाईयों का अस्पताल एवं अनसुधान केन्द्र की स्थापना भी की। एक बार दारा शिकोह किसी अनजानी बीमारी से ग्रस्त हुआ।
हर प्रकार के सबसे बेहतर हकीमों से सलाह ली गयी। परन्तु किसी प्रकार कोई भी सुधार न आया।
अन्त में गुरू साहिब की कृपा से उसका ईलाज हुआ। इस प्रकार दारा शिकोह को मौत के मुंह से बचा लिया गया।
श्री गुरू हरिराय साहिब ने लाहौर, सियालकोट, पठानकोट, साम्बा, रामगढ एवं जम्मू एवं कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों का प्रवास भी किया। उन्होने 360 मंजियों की स्थापना की। उन्होने भ्रष्ट 'मसन्द पद्धति' सुधारने हेतु सुथरेशाह, साहिबा, संगतिये, मिंया साहिब, भगत भगवान, भगत मल एवं जीत मल भगत जैसे पवित्र एवं आध्यात्मिक लोगों को मंजियों का प्रमुख नियुक्त किया।
श्री गुरू हरिराय साहिब ने अपने गुरूपद काल के दौरान बहुत सी कठिनाइयों का सामना किया। भ्रष्ट मसंद, धीरमल एवं मिनहास जैसों ने सिख पंथ के प्रसार में बाधाएं उत्पन्न की।
शाहजहां की मृत्यु के बाद गैर मुस्लिमों के प्रति शासक औरंगजेब का रूख और कड़ा हो गया।
मुगल शासक औरंगजेब ने सत्ता संघर्ष की स्थितियों में, श्री गुरू हरिराय साहिब जी द्वारा की गई दारा शिकोह की मदद को राजनैतिक बहाना बनाया।
उसने श्री गुरू साहिब पर बेबुनियाद आरोप लगाये। उन्हें दिल्ली में पेश होने का हुक्म दिया गया। श्री गुरू हरिराय साहिब जी के बदले रामराय जी दिल्ली गये।
उन्होंने धीरमल एवं मिनहास द्वारा सिख धर्म एवं गुरू घर के प्रति फैलायी गयी भ्रांतियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया। रामराय जी ने मुगल दरबार में गुरबाणी की त्रुटिपूर्ण व्याख्या की।
उस समय की राजनैतिक परिस्थितियों एवं गुरु मर्यादा की दृष्टि से यह सब निन्दनीय था।
जब श्री गुरू हरिराय साहिब जी को इस घटना के बारे में बताया गया तो उन्होने राम राय जी को तुरंत सिख पंथ से निष्कासित किया।
राष्ट्र के स्वाभिमान व गुरुघर की परम्पराओं के विरुद्ध कार्य करने के कारण रामराय जी को यह कड़ा दण्ड दिया गया। इस घटना ने सिखों में देश के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिए, ऐसे भावों का संचार हुआ।
सिख इस घटना के बाद गुरु घर की परम्पराओं के प्रति अुनशासित हो गए। इस प्रकार गुरू साहिब ने सिख धर्म के वास्तविक गुणों, जो कि गुरू ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज हैं, गुरू नानक देव जी द्वारा बनाये गये किसी भी प्रकार के नियमों में फेरबदल करने वालों के लिए एक कड़ा कानून बना दिया।
अपने अन्तिम समय को नजदीक देखते हुए उन्होने अपने सबसे छोटे पुत्र गुरू हरकिशन जी को 'अष्टम् नानक' के रूप में स्थापित किया।
कार्तिक वदी 9 (पांचवीं कार्तिक), बिक्रम सम्वत 1718, (6 अक्टूबर 1661) में कीरतपुर साहिब में ज्योति जोत समा गये।
गुरुनानक सेवा सोसायटी गुरु नानक गंज, अजमेर के पदाधिकारी एवं सदस्यों
आदि ने समूह साध संगत को वेनती की है कि समयानुसार दर्शन देकर गुरुबाणी शब्द कीर्तन स्वर्ण कर अपना जीवन सार्थक कर, लोक परलोक सुहेला करें।
🙏
अधिक समाचार पढ़े 👇 नीचे किल्क करें 👇
https://www.dailymaruprahar.page/?m=1
👇 अपने विचार कमेंट्स बाक्स में दें
(नोट :- आपके कमेंट्स प्रकाशित होने में थोडा समय लग सकता है )
👇
टिप्पणियाँ