10 लाख की मुगल सेना से श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी के 40 सिखों ने जीत हासिल की थी....
10 लाख की मुगल सेना से श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी के 40 सिखों ने जीत हासिल की थी :
"चमकौर का युध्द"
कहते हैं।
चमकौर का युद्ध 1704 में 21, 22, और 23 दिसम्बर को गुरु गोविंद सिंह और मुगलों की सेना के बीच पंजाब के चमकौर में लड़ा गया था।
गुरु गोबिंद सिंह जी 20 दिसम्बर की रात आनंद साहिब पुर साहिब छोड़ कर 21 दिसम्बर की शाम को चमकौर पहुंचे थे, और उनके पीछे मुगलों की एक विशाल सेना जिसका नेतृत्व वजीर खां कर रहा था, वह भी 22 दिसम्बर की सुबह तक चमकौर पहुँच गया था।
वजीर खां गुरु गोबिंद सिंह को जीवित या मृत पकड़ना चाहता था। चमकौर के इस युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह की सेना में केवल उनके दो बड़े साहिबजादे अजीत सिंह एवं जुझार सिंह और 40 अन्य सिंह थे।
इन 43 लोगों ने मिलकर ही वजीर खां की आधी से ज्यादा सेना का विनाश कर दिया था।
युद्ध का सरासर परिणाम:-
मुग़ल-सिख युद्ध का भाग: "चमकौर का युध्द" ।
तिथि: = 6 दिसंबर 1704,
स्थान: - चमकौर, (पंजाब)।
परिणाम: - सिखों की विजय।
योद्धा: एक तरफ सांचा देश आँकड़े मुग़ल सेना - दूसरी ओर खालसा सेना।
नायक: - वज़ीर खान - गुरु गोबिन्द सिंह।
शक्ति/क्षमता:-- 10,00,000 (दस लाख) मुगल फौज - और सिर्फ 42 खालसा सैनिक ।
चमकौर की जंग में वजीर खां के नेतृत्व में 10 लाख की फौज लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी से युध्द करने वाले हिंदू राजा:-
22 धार के हिन्दू पहाड़ी राजा -:
हिन्दू राजा केहलूर की फौज
हिन्दू राजा बड़ोली की फौज
हिन्दू राजा कसौली की फौज
हिन्दू राजा कांगड़ा की फौज
हिन्दू राजा नदौन की फौज
हिन्दू राजा नाहन की फौज
हिन्दू राजा बुड़ैल की फौज
हिन्दू राजा चंबा की फौज
हिन्दू राजा भम्बोर की फौज
हिन्दू राजा चंबोली की फौज
हिन्दू राजा जम्मू की फौज
हिन्दू राजा नूरपुर की फौज
हिन्दू राजा जसवाल की फौज
हिन्दू राजा श्रीनगर की फौज
हिन्दू राजा गड़वाल की फौज
हिन्दू राजा हिंगडोर की फौज
हिन्दू राजा मंडी की फौज
हिन्दू राजा भीमचंद की फौज
इन 22 धार के हिंदू राजाओं की फौज की अगवाई रहा भीम चंद कर रहा था, यह भीम चंद उनमें से था जिसके दादा राजा तारा चंद को गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने म गवालियर के किले से और 51 राजाओं के साथ छुड़वाया था!
और ये थे मुग़ल, मुसलमान राजा और नवाब:-
मुस्लिम सूबा सरहिंद की फौज
मुस्लिम सूबा सुल्तान की फौज
मुस्लिम सूबा पिशावर की फौज
मुस्लिम नवाब मलेरकोटला की फौज
मुस्लिम सूबा लाहौर की फौज
मुस्लिम सूबा कश्मीर की फौज
मुस्लिम जरनैल नहर खान की फौज
मुस्लिम जरनैल गनी खान को फौज
मुस्लिम जरनैल मजीद खान की फौज
मुस्लिम जरनैल मियां खान की फौज
मुस्लिम जरनैल भूरे खान को फौज
मुस्लिम जरनैल ज़लील खान की फौज
प्रधान सेनापति जरनैल खुआजा अली मर्दूद खान की फौज
सोचिए 40 सिख एक तरफ और दूसरी तरफ मैदान में यह सारे रहे जरनैल नवाब और इनकी क़रीब 10 लाख की फौज।
वजीर खान गुरु गोविंद सिंह को पकड़ने में असफल रहा, लेकिन इस युद्ध में गुरु जी के दो पुत्रों साहिबज़ादा अजीत सिंह व साहिबज़ादा जुझार सिंह और 40 सिंह भी शहीद हो गए।
गुरु गोविंद सिंह ने इस युद्ध का वर्णन ज़फ़रनामा में किया है। उन्होंने बताया है कि जब वे सरसा नदी को पार कर चमकौर पहुंचे तो किस तरह मुगलों ने उन पर हमला किया।
वजीर खान गुरु गोविंद सिंह को पकड़ने में असफल रहा, लेकिन इस युद्ध में गुरु जी के दो पुत्रों साहिबज़ादा अजीत सिंह व साहिबज़ादा जुझार सिंह और 40 सिंह भी शहीद हो गए।
गुरु गोविंद सिंह ने इस युद्ध का वर्णन ज़फ़रनामा में किया है। उन्होंने बताया है कि जब वे सरसा नदी को पार कर चमकौर पहुंचे तो किस तरह मुगलों ने उन पर हमला किया।
जफरनामा:
ज़फ़रनामा अर्थात 'विजय पत्र' गुरु गोविंद सिंह द्वारा मुग़ल शासक औरंगज़ेब को लिखा गया था।
ज़फ़रनामा, दसम ग्रंथ का एक भाग है और इसकी भाषा फ़ारसी है।
भारत के गौरवमयी इतिहास में दो पत्र विश्वविख्यात हुए। पहला पत्र छत्रपति शिवाजी महाराज के द्वारा राजा जयसिंह को लिखा गया तथा दूसरा पत्र गुरु गोविन्द सिंह जी के द्वारा शासक औरंगज़ेब को लिखा गया, जिसे ज़फ़रनामा अर्थात 'विजय पत्र' कहते हैं।
नि:संदेह गुरु गोविंद सिंह का यह पत्र आध्यात्मिकता, कूटनीति तथा शौर्य की अद्भुत त्रिवेणी है।
गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे।
उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में 52 कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता है । वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय प्रतीक हैं ।
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गुरु गोबिन्द सिंह ने पवित्र (ग्रन्थ) गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में प्रतिष्ठित किया। बचित्तर नाटक उनकी आत्मकथा है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ (ग्रन्थ), गुरु गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।
उन्होने अन्याय, अत्याचार और पापों को खत्म करने के लिए और धर्म की रक्षा के लिए मुगलों के साथ 14 युद्ध लड़े। धर्म की रक्षा के लिए समस्त परिवार का बलिदान किया।
जिसके लिए उन्हें 'सरबंसदानी' (पूरे परिवार का दानी ) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले, आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय होने के साथ-आथ गुरु गोविन्द सिंह एक महान लेखक, मौलिक चिन्तक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। 52 कवि और साहित्य-मर्मज्ञ उनके दरबार की शोभा बढ़ाते थे। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे। इसीलिए उन्हें 'संत सिपाही' भी कहा जाता है।
उन्होंने सदा प्रेम, सदाचार और भाईचारे का सन्देश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। गुरुजी की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि "धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है"।
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